जीवन की चूँकि

अब तक,वो अपने जीवन की चूंकि जमा चुकी थी, और उसी को सत्यापित भी कर चुकी थी, जोड़ घटाव और सारे समीकरण भी बैठा चुकी थी,और अपनी थ्योरी को अब प्रैक्टिकल में तब्दील कर रही थी, किसी और से प्रमाणित या ज्ञापित करवाने की अब कोई आवश्यकता नहीं थी उसे,
वो मान चुकी थी की, मैं खुश हूँ और इसलिए निहायती सुंदर भी, अब वो नए कपड़े पहन मेकअप कर सीधे ही बाहर निकल जाया करती थी, आईने की अब कोई खास ज़रूरत सी नहीं लगती थी उसे, उसने अपने हर करीबी आईने पर, अब पर्दा डाल रखा था, अब….वो बेहद ही खुशनुमा, सुंदर और सुगंधित रहने लगी थी, भयंकर तूफानों से जूझने के बाद और आगे भी आने वाले तूफानों के लिए ख़ुद को पूर्णतः तैयार समझती थी, पर…..
पर एक रोज़ कहीं से एक हल्का सा हवा का झोंका आया, शायद उसे हल्के से छूकर गुज़र जाना था, और लड़की को रहना था यूंही बेअसर, यही नीयति थी, और यही उसके मानक समीकरण भी, पर वो झोंका अपने दायरे से कहीं अधिक उपद्रवी निकला, उसने जाने अनजाने हटा दिया एक आईने से पर्दा, जिसे उसने कब से ही ढँक रक्खा था, और…
और उसे दिख गया अपना असली चेहरा, जो बिल्कुल भी वो नहीं था, जो वो माने बैठी थी, अब वो देख रही थी एक कुरूप, मुरझाया हुआ बिलखता चेहरा, रोता हुआ भी नहीं, उससे कहीं बत्तर, लाश पर चढ़ा एक कफ़न चेहरा ..
उस हवा के झोंके को तो खैर गुज़र ही जाना था, पर लड़की को अब कुछ वक़्त लगेगा फिर से पर्दा चढ़ाने और एक नई एयरप्रूफ़ चूँकि जमाने में……
…….पर यकीनन वो जमा ही लेगी……

अक्स को संवारना, कुछ जायज़ भी था मेरा,
अस्ल की बदसूरती, जो और सही नहीं जाती”

#darkwritings #depression #newlife

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मैं ‘भगवान’ हो चला

गुनाह देख कर भी सारे, अंजान हो चला,
हां, शक़ तो मुझे भी है, मैं भगवान हो चला,

मंजिल तलक पहुंचना,मुकम्मल नही हुआ,
लहरों के पास छोटा सही,तूफान हो चला।

बैठे थे मेरी टोह में, नज़रें बिछाये जो,
उन अन्धों की भी,छीनकर लाठी मैं ले चला,

चलता रहा सतत,पर पहुंचा कहीं नहीं,
खुद में जो हो मुकम्मल,वो मुकाम हो चला,

जब होश में आया,देर हो चुकी बड़ी,
चुपचाप बिस्तरा बांध,मैं शमशान हो चला

चीखती खामोशियां

अमूमन मैं, उथले उथले ही रहने की कोशिश करती हूं, यूँ नहीं की गहराई से वाकिफ नहीं, बस यूँ की अपनी ही गहराइयों में गिरने से डरती हूँ, पर कब तलक बचती…..

आज मैं निकली थी, अपनी खामोशियों की सैर पर, मीलों लम्बी फैली पसरी, स्याह घनी खामोशियां, और बधहवास मैं, पर चाह से भरी।कुछ ठोकरें लगीं, कुछ कन्कड़ों सी कुछ पत्थरों सी,कुछ भूले बिसरे मसलों की, कुछ नाकामियां तो कुछ ‘खुश्फेहमियां’मेरे ही मन के गलीचों की।
कुछ और कदमों पर एक और लम्बी सुरंग थी,थी ‘भूत’ में मैं जो, डर का सवाल कहां, बस बढ़ चली। वहाँ समीर भी खुद की ही सांसों की थी,वो आबोहवा भी मेरे ही अह्बावों की थी।वो स्याह सुरंग लम्बी तो थी ही, कातिलाना और घुटन भरी भी थी।हर दर्ज़ लहू लुहान,मेरी ही इतनी सारी कब्रों का कब्रिस्तान, वो चीखें वो पुकारें, वो कयामत की गुहारें, हाँ वेसे सन्नाटा था पसरा, पर मेरे कान फट रहे थे,मेरे अन्दर के ज़ख्म फिर नासूर बन बह रहे थे,फिर से…. मैं भागी, मैं भागी बधहवास, दौड़ते पड़ते खुद से बचते बचाते, सुरंग से बाहेर, आगे की और….
वहाँ दूर छलनी से आती रोशनी सी थी, कुछ उड़ रहा था, शायद ‘तितली’ सी थी।मैं और पास गयी, वो ‘छुअन के डर’ से ही उड़ पड़ी। शायद…वो ‘मक्खी’ थी, हाँ मक्खी ही थी, मैली, गंदी-संदी पर जैसी भी खुद में मद-मस्त, मक्खी ही रही होगी बेशक जो आगे पहुंची, तितलियों के बस की तो ये बात कहां।वो अपनी ही धुन में अपना गाना गाते हुए, जिसे ना सुनना हो उसे भी सुनाते हुए, भिन भिन किये जा रही थी,सकूं में कमस्कम जिये जा रही थी।उसकी भिन भिन में दो पल मैं भी खो बैठी, पल भर को सही, फिर से जी उठी, सहसा ही, होश आन पड़ा, आना ही था,
मन किया, उसका गाना वहीं रोक दूँ,उसके हौसले और उम्मीदों की मिट्टी की मट्की वहीं के वहीं फोड़ दूँ।
“यूँ की, दर्द जो होगा ना हाल अभी मरने में वो लाख गुना कम होगा आगे का सफर तय करने में”

हलक से ज़हर निगलते मैंने हिम्मत का पहाड़ खोदा और कह डाला-
“सुन ना, मेरी प्यारी ‘मैं’, इक बात मान, तोड़ ये पंख, और मर जा”