मैं ‘भगवान’ हो चला

गुनाह देख कर भी सारे, अंजान हो चला,
हां, शक़ तो मुझे भी है, मैं भगवान हो चला,

मंजिल तलक पहुंचना,मुकम्मल नही हुआ,
लहरों के पास छोटा सही,तूफान हो चला।

बैठे थे मेरी टोह में, नज़रें बिछाये जो,
उन अन्धों की भी,छीनकर लाठी मैं ले चला,

चलता रहा सतत,पर पहुंचा कहीं नहीं,
खुद में जो हो मुकम्मल,वो मुकाम हो चला,

जब होश में आया,देर हो चुकी बड़ी,
चुपचाप बिस्तरा बांध,मैं शमशान हो चला

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चीखती खामोशियां

अमूमन मैं, उथले उथले ही रहने की कोशिश करती हूं, यूँ नहीं की गहराई से वाकिफ नहीं, बस यूँ की अपनी ही गहराइयों में गिरने से डरती हूँ, पर कब तलक बचती…..

आज मैं निकली थी, अपनी खामोशियों की सैर पर, मीलों लम्बी फैली पसरी, स्याह घनी खामोशियां, और बधहवास मैं, पर चाह से भरी।कुछ ठोकरें लगीं, कुछ कन्कड़ों सी कुछ पत्थरों सी,कुछ भूले बिसरे मसलों की, कुछ नाकामियां तो कुछ ‘खुश्फेहमियां’मेरे ही मन के गलीचों की।
कुछ और कदमों पर एक और लम्बी सुरंग थी,थी ‘भूत’ में मैं जो, डर का सवाल कहां, बस बढ़ चली। वहाँ समीर भी खुद की ही सांसों की थी,वो आबोहवा भी मेरे ही अह्बावों की थी।वो स्याह सुरंग लम्बी तो थी ही, कातिलाना और घुटन भरी भी थी।हर दर्ज़ लहू लुहान,मेरी ही इतनी सारी कब्रों का कब्रिस्तान, वो चीखें वो पुकारें, वो कयामत की गुहारें, हाँ वेसे सन्नाटा था पसरा, पर मेरे कान फट रहे थे,मेरे अन्दर के ज़ख्म फिर नासूर बन बह रहे थे,फिर से…. मैं भागी, मैं भागी बधहवास, दौड़ते पड़ते खुद से बचते बचाते, सुरंग से बाहेर, आगे की और….
वहाँ दूर छलनी से आती रोशनी सी थी, कुछ उड़ रहा था, शायद ‘तितली’ सी थी।मैं और पास गयी, वो ‘छुअन के डर’ से ही उड़ पड़ी। शायद…वो ‘मक्खी’ थी, हाँ मक्खी ही थी, मैली, गंदी-संदी पर जैसी भी खुद में मद-मस्त, मक्खी ही रही होगी बेशक जो आगे पहुंची, तितलियों के बस की तो ये बात कहां।वो अपनी ही धुन में अपना गाना गाते हुए, जिसे ना सुनना हो उसे भी सुनाते हुए, भिन भिन किये जा रही थी,सकूं में कमस्कम जिये जा रही थी।उसकी भिन भिन में दो पल मैं भी खो बैठी, पल भर को सही, फिर से जी उठी, सहसा ही, होश आन पड़ा, आना ही था,
मन किया, उसका गाना वहीं रोक दूँ,उसके हौसले और उम्मीदों की मिट्टी की मट्की वहीं के वहीं फोड़ दूँ।
“यूँ की, दर्द जो होगा ना हाल अभी मरने में वो लाख गुना कम होगा आगे का सफर तय करने में”

हलक से ज़हर निगलते मैंने हिम्मत का पहाड़ खोदा और कह डाला-
“सुन ना, मेरी प्यारी ‘मैं’, इक बात मान, तोड़ ये पंख, और मर जा”

थी ‘फूल’वो, समझो तो सही

थी फूल वो अपने दरख़्त की,
खुशबू बिखेरा करती थी।

काट कर और चमन मे लगा डाला,
अब उम्मीद है तना बनने की।

है फूल मे ताकत बड़ी,
वो नये पेड बना सकता है।

पर है तो वो फूल उसमे नज़ाकत है,
इस बात को कोई समझे तो सही।